फरवरी में लगाई जाने वाली मुख्य सब्जियों के बारे में आज हम आपको बताएंगे। किसान भाई फरवरी के महीने हम बहुत सारी सब्जियां लगा सकते हैं लेकिन हम यहां पर कुछ ऐसी सब्जियां आपको बताएंगे जिनकी खेती करके आप ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।


फरवरी में लगाई जाने वाली 10 सब्जियां जो मुनाफे वाली खेती के लिए फायदेमंद हैं


1.भिंडी


भिंडी की उन्नत खेती: फ़रवरी और मार्च का महीना भिंडी की बुवाई के लिए सबसे बेहतरीन समय है। यदि आप वैज्ञानिक तरीके से एक एकड़ में भिंडी की खेती करते हैं, तो आप कम लागत में शानदार मुनाफा कमा सकते हैं। यहाँ एक एकड़ के अनुसार सभी आंकड़े दिए गए हैं:


1. जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil)उपयुक्त तापमान: 

25 से 35 डिग्री सेल्सियस।

मिट्टी: उपजाऊ दोमट मिट्टी जिसका pH मान 6 से 7 के बीच हो।

खेत की तैयारी: 2-3 बार गहरी जुताई करें और पाटा चलाकर खेत को समतल कर लें।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार बीज की मात्रा: 

गर्मी के मौसम (फ़रवरी-मार्च) के लिए 5 से 7 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।

बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को 'कार्बेन्डाजिम' (2 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें ताकि मिट्टी से होने वाले रोगों से बचाव हो सके।


3. बुवाई की विधि (Sowing Method): 

कतार से कतार की दूरी: 45 सेंटीमीटर। पौधे से पौधे की दूरी: 15-20 सेंटीमीटर।

बुवाई की गहराई: बीज को 2-3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक (Fertilizer Management): 

एक एकड़ के लिए खाद की मात्रा इस प्रकार है:

भिंडी की भरपूर पैदावार के लिए खाद का सही संतुलन बहुत जरूरी है। एक एकड़ खेत के लिए यूरिया, DAP और पोटाश की गणना नीचे दी गई है:


(1) बुवाई के समय (बेसल डोज):

खेत की आखिरी जुताई के समय या बुवाई के वक्त नीचे दी गई खाद डालें:


गोबर की खाद: 8-10 टन (अच्छी तरह सड़ी हुई)।


DAP (डाय अमोनियम फास्फेट): 45 किलोग्राम।


MOP (म्यूरेट ऑफ पोटाश): 35 किलोग्राम।


यूरिया: 15 किलोग्राम।


नोट: DAP में पहले से ही कुछ मात्रा में नाइट्रोजन होता है, इसलिए बुवाई के समय यूरिया कम दिया जाता है।


(2) बुवाई के 30 दिन बाद (पहली टॉप ड्रेसिंग):

जब फसल एक महीने की हो जाए, तब पौधों की जड़ों के पास यह मात्रा दें:


यूरिया: 30 किलोग्राम।


(3) बुवाई के 45-50 दिन बाद (दूसरी टॉप ड्रेसिंग):

जब फूल और फल आने की प्रक्रिया तेज हो, तब:


यूरिया: 30 किलोग्राम।


जरूरी सुझाव:

खाद देने का तरीका: यूरिया का छिड़काव हमेशा शाम के समय करें जब मिट्टी में हल्की नमी हो।


पानी का तालमेल: खाद देने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई जरूर करें ताकि पोषक तत्व जड़ों तक पहुँच सकें।


मिट्टी परीक्षण: यदि संभव हो, तो अपने खेत की मिट्टी की जांच जरूर करवाएं ताकि आप अपनी जमीन की जरूरत के अनुसार खाद की मात्रा को थोड़ा बहुत कम या ज्यादा कर सकें।


5. सिंचाई प्रबंधन (Irrigation)गर्मी के मौसम में: 

हर 5 से 6 दिन में सिंचाई की आवश्यकता होती है।

नमी का ध्यान: फूल आने और फल बनने के समय खेत में नमी कम नहीं होनी चाहिए, अन्यथा पैदावार घट सकती है।


6. प्रमुख कीट और रोग (Pest Control): 

पीला मोजेक वायरस: इसके बचाव के लिए रोग-प्रतिरोधक किस्में (जैसे अर्का अनामिका) चुनें। सफेद मक्खी को नियंत्रित करने के लिए 'इमिडाक्लोप्रिड' का छिड़काव करें।

फल छेदक: इसके नियंत्रण के लिए नीम के तेल या उचित कीटनाशक का प्रयोग करें।


7. पैदावार और लाभ (Yield):

तुड़ाई: बुवाई के 45-50 दिन बाद शुरू हो जाती है।

कुल पैदावार: सही प्रबंधन से एक एकड़ में 40 से 50 क्विंटल तक भिंडी की पैदावार प्राप्त की जा सकती है।


2. लौकी


लौकी की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल है। फ़रवरी का महीना इसकी बुवाई के लिए सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि बढ़ते तापमान के साथ इसकी बेलें तेजी से फैलती हैं।


1. उपयुक्त मिट्टी और जलवायु:

जलवायु: गर्म और आर्द्र (Humid) जलवायु लौकी के लिए सबसे अच्छी है।


मिट्टी: वैसे तो यह हर मिट्टी में हो जाती है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम है।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार:

बीज की मात्रा: एक एकड़ के लिए 1.5 से 2 किलोग्राम उन्नत किस्म के बीज पर्याप्त होते हैं।


बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को 24 घंटे पानी में भिगोकर रखें, फिर 'बाविस्टिन' (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें। इससे अंकुरण जल्दी और अच्छा होता है।


3. बुवाई की विधि (Sowing Method):

विधि: इसे थाला (Gada) बनाकर या मेड़ों (Ridges) पर बोना चाहिए।


दूरी:


लाइन से लाइन की दूरी: 2 से 2.5 मीटर


पौधे से पौधे की दूरी: 60 से 75 सेंटीमीटर


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer):

लौकी की बेलों के तेजी से विकास के लिए नीचे दी गई मात्रा का पालन करें:


बुवाई के समय (बेसल डोज):


गोबर की खाद: 10 टन।


DAP: 40 किलोग्राम।


MOP: 30 किलोग्राम।


यूरिया: 15 किलोग्राम।


बुवाई के 30-35 दिन बाद (टॉप ड्रेसिंग):


यूरिया: 25 किलोग्राम।


फूल आने के समय (50-60 दिन बाद):


यूरिया: 20 किलोग्राम।


5. सिंचाई प्रबंधन:

फ़रवरी और मार्च के दौरान हर 7 से 10 दिन में सिंचाई करें।


ध्यान रहे कि बेलों की जड़ों के पास पानी ज्यादा देर जमा न रहे, वरना जड़ सड़ने की समस्या हो सकती है।


6. प्रमुख कीट और रोग:

लाल कद्दू बीटल (Red Pumpkin Beetle): यह छोटे पौधों की पत्तियों को खाता है। बचाव के लिए नीम का तेल या इमिडाक्लोप्रिड का उपयोग करें।


पाउडरी मिल्ड्यू: पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसा जम जाता है। इसके लिए सल्फर युक्त फफूंदनाशक का छिड़काव करें।


7. पैदावार और लाभ:

तुड़ाई: बुवाई के 55 से 65 दिन बाद फल तैयार हो जाते हैं।


कुल पैदावार: अच्छी देखरेख और उन्नत किस्मों से एक एकड़ में 150 से 200 क्विंटल तक पैदावार मिल सकती है।


लौकी के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tip):

लौकी की बेलों को ज़मीन पर फैलाने के बजाय यदि मचान (Trellis System) या तार-बांस के ढांचे पर चढ़ाया जाए, तो फलों की गुणवत्ता अच्छी रहती है, उनका आकार सीधा रहता है और बाजार में दाम ज्यादा मिलता है।


3. करेला

करेले की खेती के लिए फ़रवरी और मार्च का समय सबसे उपयुक्त होता है। इस मौसम में तैयार होने वाली फसल कड़वाहट में कम और स्वाद में बेहतर होती है, जिससे बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है।


1. उपयुक्त मिट्टी और जलवायु: करेला उष्णकटिबंधीय (Tropical) पौधा है। इसके लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान आदर्श है।

मिट्टी: जीवांश युक्त दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी है। मिट्टी का pH 6 से 7 के बीच होना चाहिए।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचारबीज की मात्रा: एक एकड़ के लिए 1.5 से 2 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है।बीज उपचार: करेले का बीज सख्त होता है। जल्दी अंकुरण के लिए बीजों को 12-15 घंटे पानी में भिगोकर रखें। इसके बाद 'थायराम' (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें।

3. बुवाई की विधि:

दूरी: कतार से कतार (Line to Line): 1.5 से 2 मीटर

पौधे से पौधे (Plant to Plant): 45 से 60 सेंटीमीटर

तरीका: करेले को हमेशा मेड़ों (Beds) पर लगाना चाहिए ताकि सिंचाई का पानी सीधा तने को न छुए।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक प्रबंधन:

करेले की बेल को अच्छी बढ़त के लिए संतुलित खाद की आवश्यकता होती है:

बुवाई के समय (बेसल डोज):

गोबर की खाद: 8-10 टन।

DAP: 40 किलोग्राम।

MOP: 35 किलोग्राम।

यूरिया: 20 किलोग्राम।

बुवाई के 25-30 दिन बाद:

यूरिया: 25 किलोग्राम।

फूल आने की अवस्था पर (45-50 दिन बाद):

यूरिया: 20 किलोग्राम।


5. सिंचाई प्रबंधन:

गर्मी का मौसम शुरू होने के कारण हर 6 से 8 दिन में हल्की सिंचाई करें।फूलों के समय मिट्टी में नमी कम न होने दें, वरना फूल गिर सकते हैं।


6. प्रमुख कीट और रोग:

फल मक्खी (Fruit Fly): यह सबसे बड़ा दुश्मन है जो फलों के अंदर अंडे देती है। इससे बचाव के लिए 'फेरोमोन ट्रैप' (Pheromone Traps) का प्रयोग करें।

डाउनी मिल्ड्यू: पत्तियों पर पीले धब्बे पड़ना। इसके लिए मैंकोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव करें।


7. पैदावार और लाभ:

 तुड़ाई: बुवाई के 55 से 70 दिन बाद पहली तुड़ाई मिल जाती है।

कुल पैदावार: उन्नत तरीके से खेती करने पर एक एकड़ में 60 से 90 क्विंटल तक पैदावार हो सकती है।


करेले के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tip):

करेले की खेती में मचान विधि (Staking) का उपयोग जरूर करें। बेलों को बांस और तार के सहारे ऊपर चढ़ाने से फल जमीन पर नहीं लगते, जिससे वे सड़ते नहीं हैं और उनका रंग व चमक बेहतरीन रहती है।


4. खीरा 

खीरा गर्मियों की सबसे लोकप्रिय सलाद वाली सब्जी है। इसकी खेती में सबसे अच्छी बात यह है कि बुवाई के मात्र 45-50 दिनों के भीतर यह आपको पैसा देना शुरू कर देती है।


1. उपयुक्त मिट्टी और जलवायु:

जलवायु: खीरे के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान अंकुरण और विकास के लिए सबसे अच्छा है।

मिट्टी: बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार: 

बीज की मात्रा: एक एकड़ के लिए 800 ग्राम से 1 किलोग्राम बीज (हाइब्रिड किस्मों के लिए) पर्याप्त होता है।

बीज उपचार: बीजों को 'कार्बेन्डाजिम' (2 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करके ही बोएं।


3. बुवाई की विधि:

दूरी: कतार से कतार (Line to Line): 1.5 मीटर

पौधे से पौधे (Plant to Plant): 45 से 60 सेंटीमीटर

तरीका: इसे मेड़ों (Beds) पर लगाना चाहिए। अगर आप मल्चिंग पेपर का उपयोग करते हैं, तो पैदावार और भी बेहतर होती है।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक प्रबंधन:

खीरे की फसल को लगातार फल देने के लिए सही पोषण चाहिए:

बुवाई के समय (बेसल डोज):

गोबर की खाद: 8-10 टन।

DAP: 50 किलोग्राम।

MOP: 40 किलोग्राम।

यूरिया: 20 किलोग्राम।

बुवाई के 25-30 दिन बाद:

यूरिया: 25 किलोग्राम।

फूल आने के समय:

यूरिया: 20 किलोग्राम।


5. सिंचाई प्रबंधन: 

खीरे में 90% से ज्यादा पानी होता है, इसलिए इसे नमी की बहुत जरूरत होती है।गर्मी के मौसम में हर 4 से 5 दिन में हल्की सिंचाई करें।ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) इसके लिए सबसे सर्वोत्तम है।


6. प्रमुख कीट और रोग:

लाल बीटल (Red Beetle): यह शुरुआत में पत्तियों को बहुत नुकसान पहुँचाता है।

सफ़ेद मक्खी और थ्रिप्स: ये वायरस फैलाते हैं। इनके लिए पीला स्टिकी ट्रैप (Yellow Sticky Trap) लगाएं और आवश्यकतानुसार कीटनाशक का प्रयोग करें।


7. पैदावार और लाभ 

तुड़ाई: बुवाई के 45 से 55 दिन में शुरू।

कुल पैदावार: एक एकड़ में लगभग 80 से 120 क्विंटल तक पैदावार हो सकती है (यह उन्नत बीज और देखरेख पर निर्भर करता है)।


खीरे के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tip):

बाजार में 'देसी खीरा' और 'हाइब्रिड खीरा' (खीरा ककड़ी) की अलग-अलग मांग होती है। यदि आप बीज रहित (Seedless/Parthenocarpic) वैरायटी लगाते हैं, तो उन्हें नेट हाउस में उगाना बेहतर होता है, जबकि साधारण हाइब्रिड को आप खुले खेत में मचान विधि से उगाकर मोटा मुनाफा कमा सकते हैं।


5. तोरई

तोरई एक ऐसी बेल वाली सब्जी है जो बहुत कम लागत में तैयार हो जाती है। इसकी दो मुख्य किस्में होती हैं—एक धारीदार (Ridge Gourd) और दूसरी चिकनी (Sponge Gourd/Nenuwa)। दोनों की खेती का तरीका लगभग एक समान है।


1. उपयुक्त मिट्टी और जलवायु:

जलवायु: तोरई को गर्म और नम जलवायु पसंद है। पाला इसके लिए हानिकारक है, इसलिए फ़रवरी का अंतिम सप्ताह बुवाई के लिए श्रेष्ठ है।


मिट्टी: अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त है।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार:

बीज की मात्रा: एक एकड़ के लिए 1.5 से 2 किलोग्राम बीज पर्याप्त होते हैं।


बीज उपचार: बीजों को जल्दी अंकुरित करने के लिए बुवाई से पहले 10-12 घंटे पानी में भिगो दें। इसके बाद 'बाविस्टिन' (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें।


3. बुवाई की विधि:

दूरी: कतार से कतार (Line to Line): 2 से 2.5 मीटर

पौधे से पौधे (Plant to Plant): 60 से 75 सेंटीमीटर


तरीका: इसे थालों (Pits) में या मेड़ों के किनारे बोना चाहिए। एक जगह पर 2-3 बीज बोएं, बाद में स्वस्थ पौधे को छोड़कर बाकी निकाल दें।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक प्रबंधन:

तोरई की बेलों की अच्छी लंबाई और अधिक फल के लिए खाद का सही चार्ट:


बुवाई के समय (बेसल डोज):


गोबर की खाद: 8-10 टन।


DAP: 35 किलोग्राम।


MOP: 30 किलोग्राम।


यूरिया: 15 किलोग्राम।


बुवाई के 30 दिन बाद:


यूरिया: 20 किलोग्राम।


फूल आने की अवस्था में:


यूरिया: 20 किलोग्राम।


5. सिंचाई प्रबंधन:

तोरई को गर्मियों में नियमित सिंचाई की जरूरत होती है।


मिट्टी की नमी के अनुसार हर 7 से 8 दिन में पानी दें।


ध्यान रहे, फल लगते समय खेत सूखना नहीं चाहिए, वरना फल टेढ़े या कड़वे हो सकते हैं।


6. प्रमुख कीट और रोग:

लाल कद्दू बीटल: शुरुआती कोमल पत्तियों को खाता है।


डाउनी मिल्ड्यू: पत्तियों के नीचे फफूंद जम जाना। इसके नियंत्रण के लिए 'रिडोमिल गोल्ड' का छिड़काव करें।


फल मक्खी: इसके लिए 'फेरोमोन ट्रैप' सबसे कारगर हैं।


7. पैदावार और लाभ:

तुड़ाई: बुवाई के 60 से 70 दिन बाद पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है।


कुल पैदावार: एक एकड़ में 60 से 80 क्विंटल तक पैदावार आसानी से ली जा सकती है।


तोरई के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tip):

यदि आप बरसात से पहले अच्छी कमाई करना चाहते हैं, तो तोरई की बेलों को 'झाड़ विधि' (Pandal System) पर चढ़ाएं। इससे फल सीधे लटकते हैं, उनका रंग गहरा हरा रहता है और वे मिट्टी के संपर्क में न आने के कारण खराब नहीं होते।


6. लोबिया

लोबिया एक दलहनी फसल है जिसे सब्जी और दाल दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। फ़रवरी में लगाई गई लोबिया गर्मियों में प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत बनती है और बाज़ार में इसकी मांग भी काफी रहती है।


1. उपयुक्त मिट्टी और जलवायु:

जलवायु: लोबिया गर्म मौसम की फसल है। इसके लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान बहुत अच्छा माना जाता है।

मिट्टी: यह सभी प्रकार की मिट्टी में हो सकती है, लेकिन रेतीली दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त है।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार

बीज की मात्रा: सब्जी वाली किस्मों के लिए 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।

बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को 'राइजोबियम कल्चर' से उपचारित करें। इससे पौधों की जड़ों में गांठें अच्छी बनती हैं और फसल हवा से नाइट्रोजन सोख पाती है।


3. बुवाई की विधि

दूरी: कतार से कतार (Line to Line): 45 सेंटीमीटर

पौधे से पौधे (Plant to Plant): 10 से 15 सेंटीमीटर

तरीका: इसे समतल खेत में या मेड़ों (Beds) पर 2-3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक प्रबंधन:

लोबिया एक दलहनी फसल है, इसलिए इसे नाइट्रोजन (यूरिया) की जरूरत अन्य सब्जियों के मुकाबले कम होती है:

बुवाई के समय (बेसल डोज):

गोबर की खाद: 5-6 टन।

DAP: 40 किलोग्राम।

MOP: 20 किलोग्राम।

यूरिया: 10 किलोग्राम।

बुवाई के 30-35 दिन बाद:

यूरिया: 15 किलोग्राम (केवल तभी दें जब फसल कमजोर दिखे)।


5. सिंचाई प्रबंधन:

लोबिया सूखे को सहने की क्षमता रखती है, लेकिन गर्मियों में अच्छी फली के लिए हर 8 से 10 दिन में सिंचाई करें। फूल आने और फलियाँ बनने के समय खेत में नमी होना बहुत जरूरी है।

6. प्रमुख कीट और रोग:

माहू (Aphids): ये छोटे कीट पत्तियों का रस चूसते हैं। इसके लिए नीम के तेल का छिड़काव करें।

मोजेक वायरस: पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। इससे बचने के लिए रोग-रोधी किस्में (जैसे 'पूसा कोमल') चुनें।


7.पैदावार और लाभ:

तुड़ाई: बुवाई के 45 से 55 दिन बाद हरी फलियों की तुड़ाई शुरू हो जाती है।

कुल पैदावार: एक एकड़ में लगभग 35 से 45 क्विंटल हरी फलियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।


लोबिया के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tip):

लोबिया की जड़ों में ऐसी ग्रंथियां होती हैं जो मिट्टी में नाइट्रोजन वापस लाती हैं। इसलिए जिस खेत में आप लोबिया उगाते हैं, उसके बाद अगली जो भी फसल आप लगाएंगे, उसमें यूरिया कम देना पड़ेगा और पैदावार अच्छी होगी।


7. मिर्च 


मिर्च की खेती खरीफ (जून-जुलाई) और गर्मी (फरवरी-मार्च) दोनों मौसम में की जा सकती है। यदि आप एक एकड़ में मिर्च लगाते हैं, तो यह एक "कैश क्रॉप" के रूप में आपको मोटा मुनाफा दे सकती है।


1. जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil):

उपयुक्त तापमान: 20 से 35 डिग्री सेल्सियस। अधिक तापमान पर फूल झड़ने की समस्या हो सकती है।


मिट्टी: अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ दोमट या काली मिट्टी जिसका pH मान 6 से 7 के बीच हो।


खेत की तैयारी: 

खेत को 2-3 बार तिरछी जुताई करें। अंतिम जुताई के समय 8-10 टन गोबर की खाद अच्छी तरह मिला लें और बेड बनाकर खेती करना अधिक लाभकारी रहता है।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार:

बीज की मात्रा: हाइब्रिड किस्मों के लिए 200 से 250 ग्राम बीज एक एकड़ की नर्सरी के लिए पर्याप्त है।


बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को 'थायरम' या 'कार्बेन्डाजिम' (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें।


पौध तैयार करना: मिर्च की सीधी बुवाई नहीं होती, पहले नर्सरी में 30-35 दिन तक पौध तैयार की जाती है।


3. बुवाई की विधि (Sowing Method):

पौध रोपण का समय: जब पौध 10-15 सेंटीमीटर की हो जाए।


दूरी: कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखें।


बेड विधि: यदि संभव हो तो 3 फीट चौड़े बेड बनाकर उस पर मल्चिंग पेपर का उपयोग करें।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक (Fertilizer Management):

मिर्च में लगातार तुड़ाई होती है, इसलिए पोषक तत्वों की आपूर्ति बहुत जरूरी है।


(1) बुवाई (रोपाई) के समय:


DAP: 50 किलोग्राम


MOP (पोटाश): 40 किलोग्राम


यूरिया: 25 किलोग्राम


सिंगल सुपर फास्फेट: 50 किलोग्राम (बेहतर जड़ों के लिए)


(2) रोपाई के 25-30 दिन बाद:


यूरिया: 35 किलोग्राम


(3) फूल आने की अवस्था पर (रोपाई के 50-60 दिन बाद):


यूरिया: 35 किलोग्राम


सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients): 5 किलोग्राम (जिंक, बोरॉन आदि का मिश्रण)


विशेष सुझाव: फूल झड़ने से रोकने के लिए "प्लानोफिक्स" (Alpha Naphthyl Acetic Acid) का 3-4 मिली प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।


5. सिंचाई प्रबंधन (Irrigation):

मिर्च को मध्यम सिंचाई की आवश्यकता होती है। बहुत अधिक पानी से जड़ गलन की समस्या हो सकती है।


गर्मी में हर 6-7 दिन पर और सर्दियों में 10-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें।


टपक सिंचाई (Drip Irrigation) मिर्च के लिए सबसे उत्तम है।


6. प्रमुख कीट और रोग (Pest Control):

थ्रिप्स और सफेद मक्खी: ये मिर्च के सबसे बड़े दुश्मन हैं जो 'मरोड़िया रोग' (Leaf Curl Virus) फैलाते हैं। इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड (5 मिली प्रति 15 लीटर) या फीप्रोनिल का छिड़काव करें।


झुलसा रोग (Dieback): इसके लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 30 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।


7. पैदावार और लाभ (Yield):

तुड़ाई: रोपाई के 60-70 दिन बाद हरी मिर्च की तुड़ाई शुरू हो जाती है।


कुल पैदावार: एक एकड़ में वैज्ञानिक तरीके से 60 से 100 क्विंटल हरी मिर्च और लगभग 10-15 क्विंटल लाल सूखी मिर्च प्राप्त की जा सकती है।


लाभ: बाजार भाव के आधार पर मिर्च की खेती से किसान 1.5 से 2.5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं।


मिर्च की खेती के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tips):

बैरियर क्रॉप (सुरक्षा घेरा): खेत के चारों ओर मक्का या ज्वार की 2-3 लाइनें लगाएं। यह सफेद मक्खी और मरोड़िया वायरस को खेत में आने से रोकता है।


बोरॉन का प्रयोग: फूल आने पर बोरॉन (20%) का 1 ग्राम/लीटर के हिसाब से छिड़काव करें। इससे फूल नहीं झड़ेंगे और मिर्च में जबरदस्त चमक आएगी।


नीम तेल का सुरक्षा चक्र: फसल की शुरुआती अवस्था से ही हर 15 दिन में नीम तेल का स्प्रे करें। इससे कीटों का हमला होगा ही नहीं और दवाइयों का खर्चा बचेगा।


मल्चिंग तकनीक: प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग करें। इससे खरपतवार 0% हो जाते हैं और मिट्टी की नमी बनी रहने से मिर्च का उत्पादन 30-40% तक बढ़ जाता है।


8. शिमला मिर्च 


शिमला मिर्च की खेती मुख्य रूप से सितंबर-अक्टूबर (सर्दियों के लिए) और फरवरी-मार्च (गर्मियों के लिए) में की जाती है।


1. जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil):

तापमान: 18 से 25 डिग्री सेल्सियस इसके लिए सबसे उत्तम है। 35 डिग्री से अधिक तापमान पर फूल झड़ने लगते हैं।


मिट्टी: जल निकासी वाली उपजाऊ दोमट मिट्टी। मिट्टी का pH मान 6.0 से 6.5 के बीच होना चाहिए।


खेत की तैयारी: 2-3 बार जुताई के बाद 10 टन सड़ी गोबर की खाद और 2 किलोग्राम 'ट्राइकोडर्मा' मिलाएं ताकि मिट्टी के रोग न लगें।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा और उपचार:

बीज की मात्रा: हाइब्रिड किस्मों के लिए 150 से 200 ग्राम बीज एक एकड़ के लिए पर्याप्त हैं।


पौध तैयार करना: पहले नर्सरी में (प्रो-ट्रे में) 35-40 दिन तक पौध तैयार करें।


बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को 'कार्बेन्डाजिम' (2 ग्राम/किलो) से उपचारित करें।


3. बुवाई की विधि (Sowing Method):

रोपण: हमेशा बेड (Bed) बनाकर ही रोपाई करें।


दूरी: कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखें।


गहराई: पौधों को उतनी ही गहराई पर लगाएं जितनी वे नर्सरी में थे।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक (Fertilizer):

शिमला मिर्च को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है:


बुवाई के समय (Basal Dose): 

50 किलो DAP, 40 किलो पोटाश (MOP) और 25 किलो यूरिया।


पहली टॉप ड्रेसिंग (30 दिन बाद): 30 किलो यूरिया और 5 किलो सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)।


दूसरी टॉप ड्रेसिंग (55-60 दिन बाद): 25 किलो यूरिया और 20 किलो पोटाश (फलों के साइज के लिए)।


5. सिंचाई प्रबंधन (Irrigation):

शिमला मिर्च को नमी पसंद है पर जल-जमाव नहीं।


गर्मियों में हर 3-4 दिन में और सर्दियों में 8-10 दिन में सिंचाई करें। ड्रिप सिंचाई इसके लिए सबसे बेस्ट है।


6. प्रमुख कीट और रोग (Pest & Disease):

थ्रिप्स और माइट्स: इनसे पत्ते नीचे की ओर मुड़ने लगते हैं। नियंत्रण के लिए 'एबामेक्टिन' या 'स्पिनोसैड' का छिड़काव करें।


आर्द्र पतन (Damping Off): नर्सरी में छोटे पौधे गल जाते हैं। इससे बचने के लिए मिट्टी में नमी ज्यादा न होने दें।


7. पैदावार और लाभ (Yield):

तुड़ाई: रोपाई के 65-75 दिन बाद शुरू हो जाती है।


पैदावार: एक एकड़ में 100 से 150 क्विंटल तक पैदावार हो सकती है (खुले खेत में)। शेडनेट हाउस में यह और बढ़ जाती है।


शिमला मिर्च के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tips):

कैल्शियम नाइट्रेट का उपयोग: फल सेट होने के समय कैल्शियम नाइट्रेट का छिड़काव करें। इससे फल नीचे से सड़ते नहीं (Blossom End Rot) और उनका छिलका मोटा व चमकदार बनता है।


मल्चिंग का जादू: शिमला मिर्च में सिल्वर-ब्लैक मल्चिंग पेपर का उपयोग अनिवार्य रूप से करें। इससे फल मिट्टी के संपर्क में नहीं आते, जिससे दाग-धब्बे नहीं लगते और बाजार में ऊँचा दाम मिलता है।


शेडनेट का प्रयोग: अगर गर्मी में खेती कर रहे हैं, तो ऊपर से 50% शेडनेट लगाने से फूलों का झड़ना रुक जाता है और रंग गहरा रहता है।


9. साग वाली सब्जियां (पालक और चौलाई)


पालक सर्दियों में अधिक सफल है, जबकि चौलाई मुख्य रूप से गर्मी और बरसात की फसल है।


1. जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil):

पालक: ठंडी जलवायु पसंद करता है (15-25°C)। अधिक गर्मी में इसमें बीज जल्दी बनने लगते हैं।


चौलाई: गर्म और आर्द्र जलवायु (25-35°C) के लिए सबसे उपयुक्त है।


मिट्टी: उपजाऊ दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी अच्छी हो। pH मान 6 से 7 के बीच।


2. प्रति एकड़ बीज की मात्रा:

पालक: 10 से 12 किलोग्राम प्रति एकड़ (कतारों में बुवाई हेतु)।


चौलाई: 1 से 1.5 किलोग्राम प्रति एकड़ (बीज बहुत बारीक होते हैं इसलिए मिट्टी में मिलाकर बोएं)।


3. बुवाई की विधि (Sowing Method):

तरीका: छिड़काव विधि या कतारों में। कतारों में बुवाई (दूरी 20-25 cm) करना निराई-गुड़ाई के लिए बेहतर है।


गहराई: बीज को 1-2 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरा न बोएं।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक (Fertilizer):

साग वाली फसलों को नाइट्रोजन की अधिक आवश्यकता होती है ताकि पत्तियां हरी और मुलायम रहें:


बुवाई के समय: 8 टन गोबर की खाद + 30 किलो DAP + 20 किलो पोटाश।


प्रत्येक कटाई के बाद: 15-20 किलो यूरिया का छिड़काव करें और हल्की सिंचाई दें। इससे अगली कटाई जल्दी तैयार होती है।


5. सिंचाई और खरपतवार:

सिंचाई: पालक को नमी की ज्यादा जरूरत होती है (सर्दियों में 10-12 दिन, गर्मियों में 5-6 दिन)।


निराई: बुवाई के 15-20 दिन बाद एक बार निराई जरूर करें ताकि खरपतवार फसल को न दबाएं।


6. कटाई और पैदावार:

पालक: बुवाई के 25-30 दिन बाद पहली कटाई, फिर हर 15 दिन पर कुल 5-6 कटाइयां। पैदावार: 80-100 क्विंटल/एकड़।


चौलाई: बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली कटाई। पैदावार: 60-80 क्विंटल/एकड़।


साग वाली फसलों के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tips):

यूरिया का घोल (पालक के लिए): पहली कटाई के बाद 1% यूरिया के घोल का स्प्रे करें। इससे पत्तियां चौड़ी, गहरे हरे रंग की और बेहद नरम होती हैं, जिससे बाजार में भाव अच्छा मिलता है।


बीज की गहराई (चौलाई के लिए): चौलाई का बीज बहुत छोटा होता है। इसे बुवाई से पहले रेत या राख में मिलाकर बोएं, ताकि बीज समान रूप से पूरे खेत में गिरे और एक ही जगह पर गुच्छे न बनें।


रोग प्रबंधन: यदि पत्तियों पर छेद दिखें, तो नीम के तेल का छिड़काव करें। खाने वाली पत्तियां होने के कारण रासायनिक कीटनाशकों से बचना चाहिए।


10. टमाटर


टमाटर की रोपाई का सबसे उपयुक्त समय सितंबर-अक्टूबर (रबी) और जनवरी-फरवरी (जायद) होता है।


1. जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil):

तापमान: 20 से 28 डिग्री सेल्सियस। रात का तापमान 15-20 डिग्री रहने पर फलों का रंग बहुत गहरा लाल आता है।


मिट्टी: अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी। मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए।


तैयारी: खेत में 10 टन गोबर खाद के साथ ट्राइकोडर्मा मिलाकर अंतिम जुताई करें।


2. प्रति एकड़ बीज और पौध तैयारी:

बीज की मात्रा: हाइब्रिड किस्मों के लिए 60 से 80 ग्राम बीज प्रति एकड़।


नर्सरी: बीजों को प्रो-ट्रे या उठी हुई क्यारियों में बोएं। 25 से 30 दिन में जब पौध 4-5 पत्तों की हो जाए, तब रोपाई करें।


उपचार: रोपाई से पहले पौधों की जड़ों को 'कार्बेन्डाजिम' (1 ग्राम/लीटर पानी) के घोल में 15 मिनट डुबोएं।


3. रोपाई की विधि (Transplanting Method):

बेड विधि: टमाटर के लिए 4 फीट चौड़े बेड बनाना सबसे अच्छा है।


दूरी: कतार से कतार 3-4 फीट (किस्म के अनुसार) और पौधे से पौधे की दूरी 1.5 से 2 फीट रखें।


समय: रोपाई हमेशा शाम के समय करें ताकि पौधे मुरझाएं नहीं।


4. प्रति एकड़ खाद और उर्वरक (Fertilizer):

बुवाई (रोपाई) के समय: 50 किलो DAP, 50 किलो पोटाश और 25 किलो यूरिया।


रोपाई के 30 दिन बाद: 30 किलो यूरिया + 5 किलो माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स।


फलों की सेटिंग के समय: 0:0:50 (SOP) खाद का छिड़काव करें ताकि फल चमकदार और भारी बनें।


5. सिंचाई और सहारा देना (Staking):

सिंचाई: फूल आते समय और फल बनते समय नमी की कमी न होने दें।


सहारा देना (Pro-Tip): हाइब्रिड टमाटर (Indeterminate) को बांस और तार के सहारे बांधना जरूरी है। इससे फल जमीन पर नहीं लगते, सड़ते नहीं और पैदावार दोगुनी हो जाती है।


6. प्रमुख कीट और रोग:

फल छेदक (Fruit Borer): इसके लिए 'कोराजन' या 'फेम' का छिड़काव करें।


झुलसा रोग (Blight): पत्तियों पर काले धब्बे दिखने पर 'मैन्कोजेब' या 'रिडोमिल' का उपयोग करें।


7. पैदावार (Yield):

तुड़ाई: रोपाई के 60-70 दिन बाद।


पैदावार: एक एकड़ में 200 से 400 क्विंटल (किस्म और प्रबंधन के आधार पर)।


टमाटर के लिए विशेष सुझाव (Pro-Tips):

कैल्शियम की महत्ता: अगर टमाटर के फल नीचे से काले होकर सड़ रहे हैं (Blossom End Rot), तो समझें कैल्शियम की कमी है। कैल्शियम नाइट्रेट का छिड़काव तुरंत करें।


पॉलिनेशन (परागण): सुबह के समय पौधों को हल्के से हिलाने (Shaking) से परागण अच्छा होता है और ज्यादा फल लगते हैं।


क्रैकिंग (फटना) से बचाव: फल फटने की समस्या से बचने के लिए मिट्टी में नमी एक समान रखें और बोरॉन का प्रयोग करें। अचानक सिंचाई करने से टमाटर फटने लगते हैं।


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